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Showing posts from November, 2025

शायरी- romantic shayari

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  बड़ा बेचैन है दिल मेरा, अपनी बाँहों के इसे आगोष कर दे, थरथरा रहे है लब मेरे , रख कर अपने लब इन पर, इन्हें ख़ामोश कर दें।  लेख़क- रितेश गोयल 'बेसुध' कॉपीराइट @rgbesudh

फार्च्यूनर- fortuner

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                                                                                                                            ज़मीन बेच क बाबु की,नई फार्च्यूनर कढ़वाई है, छोड़ क अपनी जमींदारी,या बिदेशी पूंछ बँधवाई है, माँ के हाथ की नुनी रोटी इब भावती कोनी, जबत शहरी मैडम के गेला वो पनीर चौमिन खाई है, हाँ मैं उसे देसी कौम का छोरा सुं, जिसने देश की खातिर खून की नदियाँ बहाई है, लेकिन अब मैं बदल रहा हूँ, आज की पीढ़ी का मैं वो युवा नेता हूँ, जिसने अंग्रेजी के पाछे सीधी लाइन लाई है, भाड़ म गई दुनियादारी,भाड़ म गई मेरी जमींदारी, मैने तो चहिये बस गाड़ी,बंगला और सुथरी नारी, सपना स मेरा कि दारू की नदियाँ बहाऊँ,सारे यडी संग बुलाऊँ,  बिदेशी...

राजनीति की जय बोलो- politics

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                      ये कविता मैंने रामधारी सिंह दिनकर जी की कविता 'कलम आज उनकी जय बोल'  से प्रेरित होकर लिखी है।  देश को लुटा बारी-बारी , धर्म की भड़काकर चिंगारी , कुर्सी पर चढ़ कर बैठ गए है , किसकी गर्दन किसकी आरी , कदमों में रखकर जनता सारी , अंधभक्तों जरा मुँह तो खोलो, राजनीति की जय बोलो।  जिसने सच का दीप जलाया , उसे तूफानों ने घेर लिया , उसे बताकर देश का दुश्मन , उससे ही मुँह फेर लिया , सत्य पर आज असत्य भारी , अंधभक्तों जरा मुँह तो खोलो, राजनीति की जय बोलो।  पीकर न्यौछावर की घूंटे , प्रशासन ही देश को लुटे , संस्कार से पैसा भारी , हर तरफ़ है भ्रष्टाचारी , नेकी की सिर्फ़ बातें होती हर कोई है व्यापारी , अंधभक्तों जरा मुँह तो खोलो, राजनीति की जय बोलो।  न्याय की आँखों पर पट्टी , शिक्षा व्यवस्था बनी है भट्टी , दवाइयाँ जान ले रही हैं , मौत महँगी ज़िन्दगी सस्ती , चाहे जिसको भी चुन लो हर कोई लूटेगा बस्ती , आदर्शों की असल जीवन में नहीं है कोई हस्ती , अंधभक्तों जरा मुँह तो खोलो, राजनीति की जय बोलो।  जय ह...

दिलजला-diljala

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  शक कर रहा है जमाना ये मुझ पर,  कि कैसे जी रहा है ये,  बिन एक कतरा शराब के,  सारे गमों को कैसे पी रहा है ये,  ठोकरें ही दी है वक़्त ने मुझको,  पैसा भी मेरे पास नही,  अपनों का मिल जाए साथ तो,  खैर! कोई बात नही,  शब्दों को सजा कर खून से,  दिल के हिसाब मे रख दूँगा,  जख्मों को बना कर कोयला,  दिलजले की किताब में रख दूँगा,  लोग तरस खाए मुझ पर,  मैं इतना भी कमजोर नही,  जा भूल जाऊँगा तुझको,  और शीश काट कर अपना,  वतन के नाम पर रख दूँगा।  जय हिन्द।  जय भारत।  लेखक- रितेश गोयल 'बेसुध'